जगन मोहन रेड्डी बनने का दम नहीं, बिना बैनर के नहीं कोई वजूद, वंश के नाम पर चल रही दुकान

जगन मोहन रेड्डी बनने का दम नहीं, बिना बैनर के नहीं कोई वजूद, वंश के नाम पर चल रही दुकान
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जगन मोहन रेड्डी बनने का दम नहीं, बिना बैनर के नहीं कोई वजूद, वंश के नाम पर चल रही दुकान

पायलट

जिस तरह किसी भी काम में कुछ हासिल करने के लिए मेहनत की जरूरत होती है, उसी तरह राजनीति में बहुत ज्यादा मेहनत चाहिए। सचिन पायलट को जानने वाले कई पत्रकार कहते हैं कि वह मीडिया फ्रेंडली है, मृदुभाषी हैं अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं और देखने में आकर्षक छवि के हैं। राजस्थान में वसुंधरा सरकार के कार्यकाल के दौरान उन्होंने और देश में कई दौरे करें और जैसा कि वह दावा भी करते हैं कि उन्होंने भाजपा सरकार में लाठियां तक भी खाई।

सिंधिया

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया
पत्रकारों से इतना मीडिया फ्रेंडली नहीं है लेकिन जरूरत पड़ने पर अपने कुछ चुनिंदा पत्रकारों से बात करना पसंद करते हैं मध्य प्रदेश के 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सीधे तो नहीं लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार अघोषित रूप से दिखाया था लेकिन पार्टी को भाजपा के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी, 2018 के विधानसभा चुनावों में सिंधिया के अलावा कमलनाथ दिग्विजय सिंह समेत कांग्रेस के कई नेताओं ने मेहनत करी थी जिसकी वजह से वह भाजपा से ज्यादा सीटें लाने में सफल हुई।

राहुल गांधी

राहुल गांधी 2004 से सक्रिय राजनीति में है। 2004 से लेकर 2020 तक उन्होंने देश में कई बड़े दौरे किए है। राजनीति की शुरुआत में वह अपने दौरों के दौरान किसी दलित के यहां खाना खाते थे और सोते थे। उनके दौरे अखबार की सुर्खियों में काफी आते थे। चुनाव से पहले वे मैराथन राजनीतिक दौरे करते हैं। गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने मंदिरों में जाने का सिलसिला तेज कर दिया था।

जगन मोहन रेड्डी

कांग्रेस के एक नेता थे जगन मोहन रेड्डी जो अब कांग्रेस में नहीं है और उनकी अपनी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस आंध्र प्रदेश में सत्ता में हैं और खुद जगन मुख्यमंत्री हैं।

2009 में राजनीति में दस्तक के कुछ ही महीनों बाद जगनमोहन ने अपने पिता को खो दिया। इसके बाद कांग्रेस पार्टी के साथ उनका टकराव, वित्तीय मामलों में फँसने के बाद 16 महीनों की जेल उनके इर्द-गिर्द घूमती रहीं। हालांकि जगनमोहन ने राजनीतिक रूप से कभी सरेंडर नहीं किया।

2009 में 15वीं लोकसभा से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले जगनमोहन का परिवार लंबे समय से राजनीति से जुड़ा रहा है।

पहली बार वह कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में संसद पहुंचे। उनके पिता राजशेखर रेड्डी की असामयिक मृत्यु के बाद उनके पिता के कई चाहने वालों ने आत्महत्या कर ली थी।

उस समय जगन ने सोचा कि आत्महत्या करने वाले लोगों के घरों में जाकर उन्हें सांत्वना दी जानी चाहिए। इसको लेकर उन्होंने एक सांत्वना यात्रा शुरू की। हालांकि, कांग्रेस के हाई कमान ने उन्हें इस यात्रा को समाप्त करने के निर्देश दिए लेकिन जगन ने इसकी परवाह किए बिना यात्रा जारी रखी।

उन्होंने कहा कि यह उनका व्यक्तिगत मामला था और इसके बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी को ख़ुद से अलग कर लिया।

29 नवंबर 2010 को उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. सात दिसंबर 2010 को उन्होंने घोषणा की कि वह 45 दिनों में अपनी नई राजनीतिक पार्टी का गठन करेंगे।

पूर्वी गोदावरी में मार्च 2011 में उन्होंने घोषणा की कि उनकी पार्टी का नाम वाईएसआर कांग्रेस होगा। वाईएसआर का मतलब वाईएस राजशेखर रेड्डी से नहीं था. इसका मतलब युवजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी है।

इसके बाद उन्होंने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी से कडप्पा चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ा और उन्होंने 5,45,043 वोट पाकर बड़ी जीत दर्ज की।

आंध्र प्रदेश के विभाजन को लेकर भूख हड़ताल

जगन के ख़िलाफ़ कांग्रेस की यूपीए सरकार ने कई केस दर्ज किए गए और वो जेल में भी रहे। आंध्र प्रदेश को विभाजित करने का फ़ैसला जब यूपीए सरकार ने लिया तब वह जेल में ही भूख हड़ताल पर बैठ गए।

125 घंटे की भूख हड़ताल के बाद उनका शूगर और ब्लड प्रेशर का स्तर तेज़ी से नीचे चला गया. सरकार ने उन्होंने उस्मानिया अस्पताल में भर्ती कराया। जगन की मां और विधायक विजयम्मा ने भी राज्य के विभाजन के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल की।

जेल से निकलने के बाद जगन ने तेलंगाना के गठन के ख़िलाफ़ 72 घंटे का बंद का आह्वान किया। जगन और विजयम्मा ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

2014 में राज्य के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ा
आंध्र की 175 में से वाईएसआर कांग्रेस 67 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। जगन को विपक्ष के नेता की भूमिका मिली।

पदयात्रा से लोगों का दिल जीता

इसके बाद 6 नवंबर 2017 को उन्होंने ‘प्रजा संकल्प यात्रा’ की शुरुआत की जिसमें उन्होंने आंध्र प्रदेश में 3648 किलोमीटर की यात्रा पूरी की.

430 दिनों तक यात्रा 13 ज़िलों में चली और इसमें 125 विधानसभा क्षेत्र शामिल थे. यह यात्रा 9 जनवरी 2019 को समाप्त हुई. इस यात्रा के दौरान ‘हम जगन चाहते हैं, जगन को आना चाहिए’ नारा गूंजा. 3648 किलोमीटर की यात्रा के दौरान लोगों के बीच उनको लेकर उत्साह देखने को मिला.

कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने केंद्रीय मंत्री बनना बेहतर नहीं समझा बल्कि वह उचित मौक़े पर मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं तलाश रहे थे।
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