जब दस जजों ने एक गैंगस्टर का केस सुनने से मना कर दिया……

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विकास दुबे अब मर चुका है। पुलिस ने उसे गिरफ्तारी के बाद भागते हुए मार दिया है, दूसरे शब्दों में उसका एनकाउंटर हो गया है। बबलू श्रीवास्तव और मुन्ना बजरंगी के बाद ये एक अन्य बड़ा मुजरिम है, जोकि इस तरह से मारा गया है। हालांकि मुन्ना का कत्ल जेल में हुुआ था। लेकिन कहा जाता है कि उसको भी ठिकाने लगाने में प्रशासन की भूमिका रही थी। तो चलिए हम कहानी बता रहे हैं आतंक के प्रतीक अतीक की।
एक समय था जब प्रयागराज इलाहबाद हुआ करता था, तब इस शहर में कॉलेज बनना शुरू हुए थे। धीरे धीरे कॉलेज बढ़ना शुरू हुए और कॉलेजों में पढ़ रहे लड़कों का दबदबा इस शहर पर बढ़ने लगा था। नई जवानी पर पैसा कमाने का जूनून सर चढ़कर बोल रहा था। नया खून सरकारी ठेकों से लेकर उद्योग धंधों सबसे पैसा कमाने में लगा हुआ था। रंगदारी शुरू होते ही तेज़ी से ऊपर बढ़नी शुरू हो गई थी। लेकिन ये पैसा कमाने की हूक नए लड़कों में इतनी बढ़ गई थी कि अपहरण से लेकर हत्या तक भी इसको मिटाने के लिए आसानी से की जाने लगी थी। गंगा किनारे के इस शहर में एक मोहल्ला है चकिया। यहां तांगा चलाने वाला फ़िरोज़ अहमद रहता था। उसका ही एक लड़का था अतीक। जो हाईस्कूल में फेल हो गया था। लेकिन अपने पहले कत्ल ने उसे गुंडागर्दी के इमतिहान में पास कर दिया। बाप बेशक रेलवे स्टेशन से सवारियां बैठकर दो पैसे कमाता था। लेकिन अतीक ने लोगों के गले पर छुरियां रखकर पैसा छीनना सीख लिया था।
साल था 1979. प्र कुछ भी मतलब कुछ भी, हत्या और अपहरण भी. इलाहाबाद में एक मोहल्ला है चकिया. इस मोहल्ले का एक लड़का हाई स्कूल में फेल हो गया. पिता उसके इलाहाबाद स्टेशन पर तांगा चलाते थे, लेकिन अमीर बनने का चस्का तो उसे भी था. 17 साल की उम्र में हत्या का आरोप लगा और इसके बाद उसका धंधा चल निकला. खूब रंगदारी वसूली जाने लगी. नाम था अतीक अहमद. फिरोज तांगेवाले का लड़का.

उन दिनों इलाहाबाद में चांद बाबा का खौफ हुआ करता था. पुराने जानकार बताते हैं कि पुलिस भी उसके इलाके में जाने से डरती थी. अगर कोई खाकी वर्दी वाला चला गया तो पिट कर ही वापस आता. लोग कहते हैं कि उस समय तक चकिया के इस 20-22 साल के लड़के अतीक को ठीक-ठाक गुंडा माना जाने लगा था. पुलिस और नेता दोनों शह दे रहे थे. और दोनों चांद बाबा के खौफ को खत्म करना चाह रहे थे और ज़हर से ज़हर को काटने की इस कोशिश ने शहर में एक नए खौफ को जन्म दे दिया। जो आगे चलकर चांद बाबा से ज्यादा खतरनाक साबित हुआ.

अतीक के अतीक बनने का साल था 1986। उत्तर प्रदेश में में वीर बहादुर सिंह की सरकार थी, केंद्र में थे राजीव गांधी, अब तक चकिया के लड़कों का गैंग चांद बाबा से ज्यादा उस पुलिस के लिए ही खतरनाक हो चुका था। वो गैंग जिसे एक समय पुलिस ने ही शह दी थी। अब पुलिस अतीक और उसके लड़कों को गली-गली खोज रही थी। एक दिन पुलिस अतीक को उठा ले गई, बिना किसी लिखा पढ़ी क,. थाने नहीं ले गई, किसी को कोई सूचना नहीं, लोगों को लगा कि अब अतीक का एनकाउंटर होने वाला है। परिचितों ने खोजबीन शुरू की, इलाहाबाद के ही रहने वाले एक कांग्रेस के सांसद को सूचना दी गई। सांसद प्रधानमंत्री राजीव गांधी का करीबी था। दिल्ली से फोन आया और फिर पुलिस ने अतीक को छोड़ दिया।

लेकिन अब अतीक पुलिस के लिए नासूर बन चुका था, वो उसे ऐसे ही नहीं छोड़ना चाहती थी। लेकिन तब तक अतीक को भी भनक लग गई थी कि उसका एकाउंटर हो सकता है। लिहाजा एक दिन भेष बदलकर अपने एक साथी के साथ कचहरी पहुंचा वो भी बुलेट से और एक पुराने मामले में जमानत तुड़वाकर सरेंडर कर दिया। पुलिस ने भी अपनी सारी खुन्नस उसपर निकाल दी। उसके खिलाफ एनएसए लगा दिया. बाहर लोगों में मैसेज गया कि अतीक बर्बाद हो गया। लोगों में सहानुभूति पैदा हो गई। अतीक जब जेल से बाहर आया तो नये कलेवर में देख उसके समर्थक भी ठगे रह गए। वह अब नेता के चोले में था। बाद के चरणों मे वो विभिन्न चुनावों को लड़ते हुए राज्य स्तर का नेता बन गया। मुसलमानों मे अतीक की विशेष पैठ बन गई। कई सीटों पर मुसलमानों का वोट अतीक के कहने से ही पड़ता था। लिहाजा अब राजनैतिक गलियारों में अतीक की पूछ बढ़ गई थी।
फिर आया 2003 , मुलायम सिंह यादव की सरकार बनी। अतीक सपा का बड़ा चेहरा बन गए। 2004 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर से चुनाव लड़ा और संसद पहुंच गए। अब जो पुलिस उनको खत्म करना चाहती थी वो उनकी सेवा चाकरी में लग गई। इधर इलाहाबाद पश्चिमी की विधानसभा सीट खाली हुई। अतीक ने अपने भाई खालिद अजीम ऊर्फ अशरफ को मैदान में उतारा। लेकिन जिता नहीं पाए. 4 हजार वोटों से जीतकर विधायक बने बसपा के राजू पाल। राजू पाल कभी अतीक का दाहिना हाथ थे। राजू पर भी उस समय 25 मुकदमे दर्ज थे। ये हार अतीक को बर्दाश्त नहीं हुई। अक्टूबर 2004 में राजू विधायक बने। अगले महीने नवंबर में ही राजू के ऑफिस के पास बमबाजी और फायरिंग हुई, लेकिन राजू बच गए। दिसंबर में भी उनकी गाड़ी पर फायरिंग की गई। राजू ने सांसद अतीक से जान का खतरा बताया.

25 जनवरी, 2005. राजू पाल के काफिले पर हमला किया गया। राजू पाल को कई गोलियां लगीं, जिसके बाद फायरिंग करने वाले फरार हो गए. पीछे की गाड़ी में बैठे समर्थकों ने राजू पाल को एक टेंपो में लादा और अस्पताल की ओर लेकर भागे। इस दौरान फायरिंग करने वालों को लगा कि राजू पाल अब भी जिंदा है। एक बार फिर से टेंपो को घेरकर फायरिंग शुरू कर दी गई। करीब पांच किलोमीटर तक टेंपो का पीछा किया गया और गोलियां मारी गईं। अंत में जब राजू पाल जीवन ज्योति अस्पताल पहुंचे, उन्हें 19 गोलियां लग चुकी थीं. डॉक्टरों ने उनको मरा हुआ घोषित कर दियाा। राजू की पत्नी पूजा पाल ने अतीक, भाई अशरफ, फरहान और आबिद समेत लोगों पर नामजद मुकदमा दर्ज करवाया। फरहान के पिता अनीस पहलवान की हत्या का आरोप राजू पाल पर था। 9 दिन पहले ही राजू की शादी हुई थी। बसपा समर्थकों ने पूरे शहर में तोड़फोड़ शुरू कर दिया। बहुत बवाल हुआ। राजू पाल की हत्या में नामजद होने के बावजूद अतीक सत्ताधारी सपा में बने रहे। 2005 में उपचुनाव हुआ। बसपा ने पूजा पाल को उतारा, सपा ने दोबारा अशरफ को टिकट दिया। पूजा पाल के हाथों की मेंहदी भी नहीं उतरी थी, और वो विधवा हो गई थीं. लोग बताते हैं। पूजा मंच से अपने हाथ दिखाकर रोने लगती थीं. लेकिन पूजा को जनता का समर्थन नहीं मिला और अशरफ चुनाव जीत गया।
साल 2007 में एक बार फिर इलाहाबाद पश्चिमी सीट पर पूजा पाल और अशरफ आमने सामने थे। लेकिन इस बार पूजा ने अशरफ को पछाड़ दिया। मायावती की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी, सपा ने अतीक को पार्टी से बाहर कर दिया और मायावती सरकार ने ऑपरेशन अतीक शुरू किया अतीक के गैंग का चार्टर तैयार हुआ। आईएस ( इंटर स्टेट) 227। उस वक्त गैंग में 120 से ज्यादा मेंबर थे। 2 महीने के भीतर अतीक पर इलाहाबाद में 9, कौशांबी और चित्रकूट में एक-एक मुकदमा दर्ज हुआ और उसपर 20 हजार का इनाम घोषित किया गया। उसकी करोड़ों की संपत्ति सीज कर दी गई। बिल्डिंगें गिरा दी गईं और उसके खास प्रोजेक्ट अलीना सिटी को अवैध घोषित करते हुए ध्वस्त कर दिया गया। इस दौरान अतीक फरार रहा। एक सांसद होते हुए अतीक लगातार फरार रहा। लेकिन एक दिन अतीक को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और यूपी पुलिस ने अतीक को जेल में तो डाल दिया। लेकिन इसके अपराध करने को रोक न सकी। इससे भी मज़ेदार वाक्या तब हुआ जब अतीक ने जेल से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पर्चा भरा और बेल के लिए कोशिश शुरू की। लेकिन इलाहबाद हाईकोर्ट में 10 जजों ने अतीक का केस सुनने से मना कर दिया। 11वें जज ने अतीक को बेल दे दी। अतीक इस बार खुद पूजा पाल के सामने चुनाव में उतरे लेकिन जीत नहीं पाए। इसके बाद अतीक की बेल रद्द हो गई और वो फिर जेल पहुंच गए।

लेकिन मज़ेदार वाक्या तब हुआ जब दो साल पहले टीवी चैनलों पर देवरिया जेल में एक बिजनेस मैन की पिटाई का विडियो चला। लखनऊ में मोहित अग्रवाल नाम के बिजनेसमैन का अपहरण होता है और उसे देवरिया जेल में ले जाया जाता है। वहां इसकी पिटाई कर इससे कुछ कागजों पर साइन कराए जाते हैं। इससे पता चलता है कि जेल में रहकर भी अतीक अपना गुंडागर्दी का राज़ चलाता था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अतीक अहमद को गुजरात के अहमदाबाद जेल भेज दिया गया है और अब योगी सरकार उसे जेल में रखने के लिए गुजरात सरकार को एक लाख रुपये महीना दे रही है। अगर अतीक अहमद जेल में मर गया तो ठीक है लेकिन जेल से बाहर आया तो फिर एक बार वो नेता के भेष में होगा और पुलिस उसे सलाम ठोंक रही होगी।

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