बिहार में सिर्फ सुशांत सिंह राजपूत बाढ़, कोरोना सब एक तरफ

बिहार में सिर्फ सुशांत सिंह राजपूत बाढ़, कोरोना सब एक तरफ
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बिहार के चुनाव में सुशांत सिंह राजपूत का मुद्दा, बाढ़, कोरोना सब एक तरफ

नई दिल्ली।

बिहार के बाढ़ का पानी घर-घर गली-गली घुस गया है। लेकिन टीवी और ट्वीटर खोलते हैं तो रामविलास पासवान, सुशील मोदी, चिराग पासवान और ना जाने कितने बिहार के नेता सुशांत सिंह राजपूत को न्याय दिलाने की मांग करते दिखते हैं।

कोरोना वायरस से बचने के लिए बिहार के एक अस्पताल में एक आदमी ने जैसे तैसे पैसे का जुगाड़ कर अपना खुद का ऑक्सीजन का सिलेंडर लेकर अस्पताल पहुंच गया। लेकिन बिहार के बड़े-बड़े नेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को लेकर जमीन आसमान एक कर रहे हैं।

सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या के पीछे की गुत्थी सुलझनी चाहिए और उनके परिवार को न्याय मिलना चाहिए। राजपूत एक बड़े फिल्म स्टार थे उनकी आत्महत्या को लेकर जिस तरीके से रोचक स्टोरी बन रही है, उसको टीवी चैनल बहुत ज्यादा दिखा रहे हैं लिहाजा बिहार के नेता नेताओं ने पूरा फोकस वहां पर लगा दिया है।

बिहार के किसी नेता को अभी तक दूरदराज के गांवों में बाढ़ के पानी से जूझ रहे लोगों के बीच टीवी या सोशल मीडिया में देखा नहीं गया। बाइट जरूर देखी गई लेकिन टीवी चैनल में उसे ज्यादा चलाया नहीं क्योंकि उनको लगता है कि सुशांत सिंह राजपूत की स्टोरी में ज्यादा दम है।

नवरुणा

हमारे एक साथी इकनॉमिक टाइम्स में पत्रकार कुमार अंशुमन ने अपने ट्वीटर हैंडल में बिहार
की नवरुणा 12 साल की लड़की की मुजफ्फरपुर से 18, सितम्बर 2012 में घर से अचानक गायब होने की कहानी लिखी है। हिंदू अखबार के वरिष्ठ पत्रकार अमरेश तिवारी ने भी अपने अखबार में नवरुणा की पूरी कहानी लिखी है।

अंशुमन के ट्विटर पोस्ट में लिखा है👇

18 सितम्बर 2012 की रात में जवाहरलाल रोड, मुजफ्फरपुर , बिहार में 12 साल की नवरुणा अपने घर में सो रही थी। रात को तीन लोग खिड़की तोड़कर उसके कमरे में घुसे और उसको बेहोश कर चादर में लपेट कर उठा कर ले गए।

पिता ने बाद में बताया की उस रात तीन लोगों को सामने देख बहुत डर गयी होगी नवरुणा। उसका बिस्तर गीला था।

पत्रकार अंशुमन अपने पोस्ट में आगे लिखते है,

”बताते हैं की कुछ लोग उसके पिता से 140 साल पुराना शहर के पॉश इलाके में स्थित वो घर खरीदना चाहते थे। पिता बेचने को तैयार नहीं थे। नवरुणा का अपहरण उन्हें डराने के लिए किया गया। 19 सितम्बर को पिता ने पुलिस स्टेशन में कैसे दर्ज कराया।”

अंशुमन आगे लिखते है,

बड़ी बहन नवरूपा जो दिल्ली में रहकर पढ़ती थी, ने सोशल मीडिया में #SaveNavruna कैम्पेन भी चलाया। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मानवाधिकार आयोग सब दरवाजा खटखटाया। 26 नवंबर 2012 को घर के पास एक ड्रेन से बिना सिर का कंकाल मिला। पुलिस ने बताया की वो नवरुणा ही है पर परिवार नहीं माना।

12 जनवरी 2013 को सीआईडी को केस सौंपा गया। घटना के 40 दिन बाद उस वक़्त के एडीजीपी और वर्तमान में डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय उसके परिवार से मिलने पहुंचे। 45 दिन बाद फॉरेंसिक की टीम पहुंची। जांच चलती रही केस चलता रहा।

परिवार दो बार नीतीश कुमार से मिला, आग्रह किया की केस सीबीआई को दे दिया जाये। एक अपील सुप्रीम कोर्ट में भी की। अपनी उस अपील में अमूल्य चक्रवर्ती ने 11 लोगों का नाम दिया जिसमे कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी थे। अमूल्य ने कहा की उन्हें इन सब लोगों के अपहरण में शामिल होने पर शक है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने फ़रवरी 2014 को केस में जांच शुरू की। 20 अगस्त 2014 को सीबीआई ने डीएनए टेस्ट के आधार पर ये कहा की वो कंकाल नवरुणा ही है। पर पिता का कहना है की वो रिपोर्ट उन्हें नहीं मिली और उनके हिसाब से वो कंकाल किसी 50 -55 साल की महिला का है ।

केस के बारे में सूचना देने वाले को 10 लाख रुपये के इनाम की घोषणा हुई। नतीजा कुछ नहीं। कुछ लोगों को शक के आधार पर गिरफ्तार भी किया गया पर सब छूट गए। सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च 2020 तक जांच पूरी करने का आदेश दिया था। अभी कोर्ट ने मार्च में दसवीं बार छह महीने का एक्सटेंशन दिया है

अंशुमन ने लिखा है, नवरुणा केस देश की प्रीमियर जांच एजेंसी और बिहार पुलिस की विफलताओं का जीता जागता स्मारक है। जी हाँ वही बिहार पुलिस जो मुंबई में सुशांत सिंह राजपूत का केस सोल्व करने पहुंची है। नवरुणा कोई बड़ा स्टार नहीं थी और नहीं उसके लिए ‘प्राइड ऑफ़ बिहार’ जैसा कोई शब्द इस्तेमाल किया गया।

अंशुमन के कहते है, सुशांत सिंह से टीआरपी आती है और चुनाव भी हैं। बिहार सरकार ने पैरवी के लिया बड़ा वकील रखा है। मुझे नवरुणा और सुशांत सिंह राजपूत, दोनों के पिता से सहानुभूति है और चाहता हूँ दोनों केस सोल्व हों। हर बच्चा अपने माँ बाप के लिया स्टार होता है। कोई यूहीं अपने बच्चे का नाम ‘सोना’ नहीं रखता।
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