बीजेपी के सियासी चक्रव्यूह में फंसे अखिलेश यादव, यादव और पसमांदा मुसलमान में सेंध मारी दे रही है टेंशन

बीजेपी के सियासी चक्रव्यूह में फंसे अखिलेश यादव, यादव और पसमांदा मुसलमान में सेंध मारी दे रही है टेंशन
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उत्तर प्रदेश की सियासत में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। आमतौर पर हिंदू और उच्च वर्ग की पार्टी माने जाने वाली बीजेपी की नजर अब ओबीसी यादव और मुस्लिम वोट बैंक पर नजर है। पीएम नरेंद्र मोदी ने समाजवादी नेता और मुलायम सिंह यादव के करीबी सहयोगी हरमोहन सिंह यादव की 10वींपुण्यतिथि के मौके पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित किया। इतना ही नहीं मंच पर पूर्व डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा, विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना समेत कई भाजपा नेता मौजूद थे। वहीं हरमोहन की याद में आयोजित कार्यक्रमों में शामिल हुए सपाई काफी देर तक अनुपस्थित रहे। समाजवादी नेता होने के साथ-साथ हरमोहन अखिल भारतीय यादव महासभा के अध्यक्ष भी रहे। यही वजह थी कि सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में 12 राज्यों के यादव इकट्ठे हुए थे। हरमोहन यादव के बेटे सुखराम यादव और उनके पोते मोहित यादव अब बीजेपी के सदस्य हैं।

साफ है कि हरमोहन यादव समाजवादी विरासत के नेता ही नहीं थे बल्कि बिरादरी में भी उनकी ख्याति थी। ऐसे में बीजेपी यादव वोट बैंक को उनके परिवार के करीबी को एक संदेश देने की कोशिश कर रही है, जिससे आने वाले दिनों में अखिलेश यादव की टेंशन बढ़ सकती है। वो भी ऐसे समय में जब उनके चाचा शिवपाल यादव के साथ मनमुटाव चल रहा है और अपर्णा यादव पहले ही बीजेपी की सदस्य बन चुकी हैं. हाल के वर्षों में अखिलेश यादव की पहली चुनावी परीक्षा 2024 के आम चुनाव में होने वाली है और भाजपा की ओर थोड़ा सा झुकाव भी अखिलेश के लिए मुसीबतें बढ़ाएगा। उपचुनाव के नतीजों में खासकर आजमगढ़ और रामपुर जैसी सीटों पर इस तरह के संकेत पहले ही दे दिए गए हैं कि भाजपा गढ़ में भी सेंध लगा सकती है।

क्या कहते हैं बीजेपी को लेकर पसमांदा नेता

अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष जावेद मलिक का कहना है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने बीजेपी से पसमांदा मुसलमानों पर फोकस करने का आह्वान किया है। मुसलमानों में पसमांदा की आबादी 80 से 85 प्रतिशत है। अब इनका झुकाव बीजेपी तरफ जा रहा है। क्योंकि बीजेपी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जो सबका साथ सबका विकास के एजेंडे पर चल रही है। उनका कहना है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 8 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे। यही वजह है कि अब वह आगे की तैयारियों के लिए उत्साहित हैं और स्नेह यात्रा जैसे प्रयोगों के जरिए अगर उन्हें मुसलमानों का स्नेह मिल जाए तो नतीजे काफी अलग हो सकते हैं। भले ही बीजेपी को बड़ा मुस्लिम वोट न मिले, लेकिन अगर वह कई वोट काटने वाली पार्टियों में भागीदार बनती है तो समीकरण बदलने की संभावना बन जाएगी। यूपी में बीजेपी को चुनौती देने वाले अकेले नेता अखिलेश यादव के लिए यही असली चिंता है।

इन जिलों में बढ़ेगी अखिलेश यादव की मुश्किल

भाजपा ने ओबीसी और दलित वर्ग के एक बड़े हिस्से पर दावा करने के बाद यादवों और मुसलमानों के बीच अपना अभियान तेज कर दिया है। अगर इन वर्गों का थोड़ा सा भी हिस्सा मिल जाए तो फिर फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, कन्नौज, कानपुर देहात, आजमगढ़ जैसे यादव बहुल जिलों में समीकरण बदल सकता है। इसके अलावा मुस्लिम बहुल मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, बहराइच, रामपुर, अमरोहा, संभल, बिजनौर, बलरामपुर, सहारनपुर, हापुड़, बरेली, श्रावस्ती, शामली, मेरठ, बागपत में भी स्थिति बदल सकती है। इन जिलों में मुस्लिम आबादी 25 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में सपा उन्हें अनुकूल मान रही है, लेकिन रामपुर के नतीजों ने इस दावे को भी कमजोर कर दिया है। यह समाजवादी पार्टी के लिए चेतावनी की तरह है।

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