Hathras gang rape: महिला का परिवार बोला पंडित या ठाकुर होते तो नहीं खोते बेटी

Hathras gang rape: महिला का परिवार बोला पंडित या ठाकुर होते तो नहीं खोते बेटी
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Hathras gang rape: महिला का परिवार बोला पंडित (Pandit) या ठाकुर (Thakur) तो नहीं खोते बेटी

मंगलवार को 20 वर्षीय हाथरस (Hathras) की जिस दलित (Dalit) लड़की (girl) की सामूहिक बलात्कार (Gangrape) के बाद मौत हो गई उसका परिवार इस बात को लेकर बिल्कुल निश्चित है कि आखिर क्यों उसे निशाना बनाया गया?

बुलगारी गांव (Bulgari village) के इस परिवार का कहना है कि वह अपनी बेटी को नहीं खोते अगर वह पंडित या ठाकुर होती। यह दो उच्च जाति का समुदाय बुलगारी गांव में बहुसंख्यक है।

अंग्रेजी समाचार वेबसाइट द प्रिंट की रिपोर्ट में कहा गया है कि 20 साल की पीड़िता और उसका परिवार वाल्मीकि (balmiki) समुदाय से हैं। बुलगारी गांव से 200 घरों में से सिर्फ दो घर दलित परिवारों से हैं।

20 वर्षीय पीड़िता 14 सितंबर को चारा लेने गई थी जब चार उच्च जाति के लड़के जो उसके पड़ोस में रहते थे उन्होंने कथित तौर पर उसे बाजरा की खेती में खींच लिया और उसके साथ यौन शोषण किया और बुरी तरह पीटा। जब वह बदहवास हो गई तो आरोप है कि उन्होंने उसकी जीभ तक काट ली।

मंगलवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल (Safdarjang Hospital) में उसकी मौत हो गई क्योंकि जख्म काफी गहरे थे जिसकी वजह से बचाया नहीं जा सका।

हाथरस बलात्कार की घटना पर पूरे देश का ध्यान गया है जबकि पीड़िता के परिवार के लिए यह एक जातीय भेदभाव है जो पूरे उत्तर प्रदेश में काफी गहराई तक घुस गया है।

प्रिंट अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने परिवार का दर्द तब और ज्यादा बढ़ा दिया जब उनको बेटी का अंतिम संस्कार भी रीति रिवाज से करने नहीं दिया गया। यहां तक कि परिवार का कहना है कि उनको अपने बेटी का अंतिम दर्शन भी करने को नहीं मिला।

इस मामले में चार उच्च जाति के आरोपियों की पहचान हुई है संदीप, उसका अंकल रवि, उसके दोस्त लव कुश और रामू जो पिछले हफ्ते गिरफ्तार हो चुके हैं।

हाथरस के इस गांव में बंट चुकी हैं सीमाएं

गांव में प्रवेश करते ही पता लगता है कि दलित और दूसरी जातियों के लोगों ने अपनी अलग अलग दुनिया बसा रखी है।

पीड़ित और आरोपी का घर एक दूसरे से कुछ 200 मीटर की दूरी पर है लेकिन दोनों घरों के बीच में काफी आम समानताएं देखने को मिल जाएंगी।

उच्च जाति के लोगों के घर ज्यादातर दो मंजिला है, कंक्रीट की ऊंची दीवारें और बड़े गेट लगे हुए हैं जबकि 2 दलित परिवारों के घर छोटे दो कमरे कंक्रीट और मिट्टी के बने हुए हैं।

ठाकुर और पंडितों की अपनी जमीन है लेकिन इन दो वाल्मीकि परिवारों की रोजी-रोटी डेयरी के उत्पादों और दैनिक मजदूरी से चलती है।

अंग्रेजी वेबसाइट द प्रिंट की टीम जब गांव में मंगलवार को रात पहुंची तो सभी ठाकुर और पंडितों के परिवार अंदर से ताला लगे हुए थे जबकि पीड़ित के परिवार बाहर दुख और गुस्से में थे और पीड़िता के शव की एक झलक देखना चाहते थे।

उच्च जाति के लोगों से बात इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि सभी अंदर अपने घरों में हो गए और बाहर नहीं आए।

लेकिन उनके दलित पड़ोसी बताते हैं कि किस तरीके से गांव में जातियों के बीच दीवारें खींची हुई है।

पीड़ित की भाभी ने द प्रिंट को कहा, उच्च जाति के लोग उनको हर तरीके से सताने कि कोई कसर नहीं छोड़ते यहां तक की वे अपनी तरफ से सड़क पर चलने में नहीं देते और नाली का गंदा पानी उनके घरों की ओर बहा देते हैं।

पीड़ित के एक चचेरे भाई ने कहा कि इस भेदभाव से बचने के लिए हम लोग दिल्ली में काम करते हैं कब तक इस सब को बर्दाश्त किया जा सकता है, बुनियादी सुविधाओं के लिए कब तक हम ऐसे लड़ते रहेंगे। वह दिल्ली में एक फैक्ट्री में काम करते हैं।

पीड़िता की मां ने कहा, यहां तक कि पुलिस भी अभियुक्तों के खिलाफ तुरंत कार्यवाही नहीं करी क्योंकि वह उच्च जाति के थे।

पीड़िता की मां ने कहा, यहां पर इंसान का जात पहले देखते हैं फिर कुछ काम करते हैं। वह देखते-देखते हैवान बन गए हैं सब। पुलिस ने भी हमें पहले बोला था चंदवा थाना में कि हम नाटक कर रहे हैं, बेटी को कुछ ज्यादा नहीं हुआ है।

“हाथरस के पुलिस निरीक्षक एसपी विक्रांत वीर ने इन आरोपों को खारिज किया लेकिन यह कहा कि पुलिस थाने के इंचार्ज को पुलिस लाइन कर दिया गया है।

द प्रिंट वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक बुलगारी गांव के वाल्मीकि आरोप लगाते हैं कि दुख इस बात का है की लड़की के साथ हुई अपराध की जांच वह सरकार कर रही है जिसके मुखिया ठाकुर जाति के हैं। दरअसल 2017 में समाजवादी पार्टी को हराने के बाद सत्ता में आई योगी सरकार के कार्यकाल में जातिगत से जुड़ी खबरें सुर्खियों में रही है।
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