मदमहेश्वर घाटी के रांसी गांव में अदभुत परम्परा

मदमहेश्वर घाटी के रांसी गांव में अदभुत परम्परा
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harendra negi   
भगवती राकेश्वरी मंदिर में दो माह तक चले पौराणिक जागर हुआ संपंन
नंगे पांव 14 हजार फीट की ऊंचाई से बह्मकमल लेकर आए श्रद्धालु
सैकड़ों श्रद्धालुओं ने कार्यक्रम में प्रतिभाग कर लिया आशीर्वाद
रूरुद्रप्रयाग। मदमहेश्वर घाटी के रांसी गांव में विराजमान भगवती राकेश्वरी मंदिर में विगत दो माह से चल रहे पौराणिक जागरां का समापन दुर्योधन वधए युधिष्ठिर के राजतिलक तथा भगवती राकेश्वरी को बह्मकमल अर्पित करने के साथ हुआ। पौराणिक जागरों के समापन अवसर पर मदमहेश्वर घाटी के दर्जनों गांवों के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रतिभाग कर भगवती राकेश्वरी की पूजा अर्चना कर विश्व कल्याण की कामना की।
दशकों से चली आ रही परम्परा के अनुसार भगवती राकेश्वरी मंदिर में सावन मास की संक्रान्ति से लेकर आश्विन की माह की दो गते तक पौराणिक जागरों के माध्यम से 33 कोटि देवी.देवताओं की महिमा का गुणगान किया जाता है। इसी परम्परा के तहत इस वर्ष भी सावन मास की सक्रांति से पौराणिक जागर शुरू किये गये थेए जिसका समापन भगवती राकेश्वरी को बह्मकमल अर्पित करने के साथ हुआ। दो माह तक चलने वाले पौराणिक जागरों में पृथ्वी की उत्पत्तिए कृष्ण जन्मए कृष्ण लीलाए कंस वधए शिव पार्वती उत्पत्तिए शिव पार्वती विवाह आदि लीलाओं व महिमा का गुणगान किया जाता है। जागरों के अन्त में कौरव.पाण्डवों की उत्पत्तिए महाभारत युद्धए दुर्योधन वधए युधिष्ठिर का राज्यभिषेक का गुणगान भी जागरों में किया जाता है। पाण्डवों के स्वर्ग गमन की महिमा के साथ ही पौराणिक जागरों का समापन किया जाता है। पौराणिक जागरों के गायन में प्रतिदिन हरिद्वार से लेकर चैखम्बा तक सभी देवी.देवताओं की स्तुति की जाती है। जागरों का समापन भगवती राकेश्वरी को बह्मकमल अर्पित करने के साथ होता है और इस बार श्रद्धालु तीन दिनों का अनुष्ठान रखकर नंगे पांव लगभग 14 हजार फीट की ऊंचाई से परम्परानुसार बह्मकमल लाए तथा भगवती राकेश्वरी को अर्पित कर पौराणिक जागरों का समापन हुआ। पौराणिक जागर सावन माह में शुरु होते हैं और आश्विन की दो गते को जागरों का समापन होता है। राकेश्वरी मन्दिर में पौराणिक जागर के समापन का समय बड़ा मार्मिक होता है। पौराणिक जागरों के गायन से क्षेत्र का वातावरण दो माह तक भक्तिमय बना रहा।

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