National commission of scheduled caste :दलित आदिवासियों का दुख सुनने वाले राष्ट्रीय आयोग में ना अध्यक्ष और ना ही सदस्य, यूपी में भी यही हाल

National commission of scheduled caste :दलित आदिवासियों का दुख सुनने वाले राष्ट्रीय आयोग में ना अध्यक्ष और ना ही सदस्य, यूपी में भी यही हाल
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दलित वर्ग के अधिकारों और उनके मान-सम्मान पर आघात करने के मामलों की सुनवाई करने वाले सरकार के उच्च संवैधानिक संस्थान में अहम पदाधिकारी ही सालों से नियुक्त नहीं हो पाए हैं। केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकार के इन उच्च संवैधानिक संस्थानों का यही हाल है। उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में ही एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में पिछले 4 महीने से ना तो अध्यक्ष है और ना ही अन्य सदस्य।

वही उत्तर प्रदेश एससी एसटी आयोग ने पिछले 10 महीने से ना अध्यक्ष और ना ही सदस्य है।

यह संस्थान दलितों और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए बनाए गए थे।

राष्ट्रीय आयोग का काम ना सिर्फ दलित समुदाय के लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है बल्कि उनके अधिकारों के हनन से संबंधित मामलों की जांच भी करना है।

हाल में ही राष्ट्रीय आयोग के पदाधिकारियों का कार्यकाल मई में खत्म हुआ है। भाजपा नेता और पूर्व सांसद रामशंकर कठेरिया इसके अध्यक्ष थे और एल मुरूगन जो भाजपा के तमिल नाडु इकाई के अध्यक्ष हैं, वह इसके उपाध्यक्ष थे।

इस मुद्दे पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय का कहना है कि सरकार इन नियुक्तियों को भरने का काम कर रही है और चयन प्रक्रिया जारी है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग काम करता है।

दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों ने मोदी सरकार को दलित विरोधी करार दिया है। कांग्रेस के दलित नेता और सांसद पीएल पुनिया का कहना है कि मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में यह समुदाय से जुड़े आयोग कभी नहीं रहे है। दलित समुदाय के दुखों को दूर करने के लिए यह आयोग बनाया गया था लेकिन मोदी सरकार केके इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मोदी सरकार अपने ऊपर कोई संवैधानिक अथॉरिटी नहीं चाहती इसलिए उसने इन संस्थानों को कमजोर करके रखा हुआ है। पीएल पुनिया यूपीए सरकार के कार्यकाल में खुद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष दो बार रह चुके हैं।

उत्तर प्रदेश एससी एसटी आयोग में अध्यक्ष का पद पिछले 10 महीने से खाली पड़ा है। इस पद पर पूर्व पुलिस महानिदेशक बृजलाल नवंबर 2019 में रिटायर हो चुके हैं।यूपी में विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि मोदी सरकार जानबूझकर इन पदों को खाली रख रही है ताकि दलित अत्याचारों से जुड़े मामलों में उनकी सरकार की कोई जवाबदेही ना हो।
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