संसदीय समिति बोली, महामारी के बाद भी जारी रहनी चाहिए वर्चुअल कोर्ट, सरकार करें कानून में बदलाव

संसदीय समिति बोली, महामारी के बाद भी जारी रहनी चाहिए वर्चुअल कोर्ट, सरकार करें कानून में बदलाव
0 0
Read Time:5 Minute, 1 Second

 

कार्मिक, जन शिकायत, कानून और न्याय संबंधी मामलों की संसदीय समिति ने शुक्रवार को सिफारिश की है कि महामारी के बाद भी वर्चुअल कोर्ट की कार्यवाही जारी रखनी चाहिए और इसके लिए सरकार को कानून में आवश्यक संशोधन करना चाहिए।

कोर्ट रूम “पब्लिक प्लेस” नहीं

संसदीय समिति के अध्यक्ष भाजपा के सांसद भूपेंद्र सिंह यादव हैं और उनकी इस कमेटी ने इस अवधारणा पर यह सिफारिश की है कि कोर्ट रूम जनसेवा देने वाला संस्थान है ना कि कोई सार्वजनिक स्थान( पब्लिक प्लेस)।

यादव ने इस संबंध में राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू के सामने अंतरिम रिपोर्ट पेश की है और संसदीय समितियों की यह पहली रिपोर्ट है जो कोविड-19 महामारी के असर पर अध्ययन कर रही है।

वकील नाराज, कहा होंगे बर्बाद

संसदीय समिति की यह सिफारिश देशभर के वकीलों को खल सकती है क्योंकि वह लगातार वर्चुअल कोर्ट का विरोध कर रहे हैं और सर्वोच्च संस्थाओं से मांग कर रहे हैं कि सामान्य तरीके से अदालतें कार्यवाही करना शुरू करें क्योंकि वर्चुअल कोर्ट की वजह से कई वकीलों को अपना पेशा छोड़ना पड़ रहा है और कई तो आत्महत्या भी कर चुके हैं।

50 फ़ीसदी वकीलों के पास लैपटॉप, कम्प्यूटर नहीं

वकीलों ने समिति के सामने भी कनेक्टिविटी का मुद्दा उठाया था। वकीलों की इस शिकायत पर समिति ने कहा है कि दूरसंचार मंत्रालय को समयबद्ध तरीके से राष्ट्रीय ब्रॉडबैंड मिशन को लागू करना चाहिए ताकि देश की संचार सेटेलाइट के जरिए यह सेवा मुहैया कराई जाएं और सबको ब्रॉडबैंड की सेवा पहुंचाने का लक्ष्य पूरा हो सके।

समिति के सामने बार काउंसिल के एक प्रतिनिधि ने वर्चुअल कोर्ट का यह तर्क देकर विरोध किया था कि जिला अदालतों में 50 फ़ीसदी वकीलों के पास तो लैपटॉप और कंप्यूटर की सुविधाएं तक नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने लॉकडाउन लागू होने से ठीक पहले 23 मार्च को वर्चुअल तरीके से सुनवाई की थी और 6 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश एस बोबडे ने अनुच्छेद 142 के तहत आदेश दिया था कि सभी अदालतें वर्चुअल तरीके से सुनवाई करें और जिला अदालतों को भी इसे लेकर कानूनी जामा पहनाया गया था।

डिजिटल सुनवाई सस्ती

संसदीय समिति ने वर्चुअल कोर्ट रूम का मजबूती से समर्थन किया है। समिति का कहना है कि डिजिटल तरीके से सुनवाई सस्ती है और तेजी से भी होती है क्योंकि सामान्य तरीके से सुनवाई करने में आने जाने की परेशानी और पैसा भी ज्यादा लगता है।

समिति ने नोट किया कि वर्चुअल कोर्ट से गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती हैं, प्रक्रियाओं में तेजी लाई जा सकती हैं और पारंपरिक अदालतों पर सुधार किया जा सकता हैं, क्योंकि वर्चुअल कोर्ट रूम अधिक सस्ती, लोगों के अनुकूल और न्याय के लिए अधिक पहुंच प्रदान करने वाली हैं।

समिति ने आगे जोर देकर कहा कि यह समय है कि अदालतें, जिन्हें अक्सर पुरातनपंथी कार्य पद्धतियों के अंतिम गढ़ के रूप में माना जाता है, “नवीनतम तकनीक के लिए अपने दरवाजे खोलें”।

सरकार करें व्यवस्था

हालाँकि, वर्चुअल अदालतों के कामकाज से जुड़ी कुछ चिंताओं को भी ध्यान में रखा गया है जैसे कि सीमित पहुंच, कनेक्टिविटी मुद्दे और वकीलों का कौशल। इसके लिए समिति ने सरकार से अनुरोध किया कि वह वर्चुअल अदालतों को देश के कानूनी पारिस्थितिकी तंत्र में एकीकृत करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को सक्षम करे।
——-

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Social profiles